21 January 2018 00:00:00 AM Breaking News
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80 वर्षीय वृद्व दम्पति पुत्र और बहुओं से प्रताड़ित, भूख मरने की नौबत

लेकिन एसडीएम ने दबाव मे आकर 15 दिन मे बदल दिया फैसला
अब बुजुर्ग दम्पति को 9 हजार नही, 1500 रूपये मे करना होगा गुजारा
बाड़मेर। नौकरशाह उपरी दबाव एवं सिफारिश से किस तरह अपने ही किए फैसलों को बेवजह गैर कानूनी ढंग से बदल देते हैं उसका उदाहरण बनकर सामने आये हैं बाड़मेर के उपखण्ड मजिस्ट्रेट। शर्मनाक बात तो यह हैं कि इस अफसर को भूख मरने की हालत मे रह रहे 80 साल के वृद्व दम्पति पर भी रहम नही आया। यह दम्पति बेटों एवं बहुओं से प्रताड़ित होकर अपने ही खेत के एक झौंपे मे अलग रहने को मजबूर हैं। 
दरअसल, मामला यह हैं कि राईकों की ढाणी सरनू चिमनजी निवासी वृद्व राणाराम और उसकी पत्नि श्रीमती हेमीदेवी ने वृद्व माता पिता भरण पोषण अधिनियम 2007 के तहत एक प्रार्थना पत्र बाड़मेर के उपखण्ड मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया। दम्पति ने अपनी याचिका मे लिखा कि उनके दो पुत्र एवं उसकी बहुओं द्वारा उनके साथ मारपीट की जा रही हैं और उन्हें रोटी नही दी जा रही हैं। इनकी प्रताड़नाओं से परेशान होकर वह मजबूरन अपने खेत मे अलग से रह रहे हैं तथा बीमारी हालत के कारण लाचार हैं। यह भी इल्जाम लगाया कि उसके पुत्र उन्हें खेती नही करने दे रहे हैं। याचिका मे भरण पोषण भत्ता दिलाने के साथ मारपीट से रोकने, बेदखल नही करने देने की भी गुहार लगाई गई।
उपखण्ड मजिस्ट्रेट ने 13 नवंबर 17 को इस याचिका पर फैसला दिया कि दम्पति के तीनों बेटे तीन तीन हजार महिने के यानि कि कुल 9000 रूपये प्रतिमाह गुजारा भत्ता के रूप मे देंगे।आदेश मे सद्व्यवहार करने एवं सार संभाल के साथ बीमारी के उपचार का जिम्मा भी तीनों बेटों पर डाला। फैसले मे एसडीएम ने पिता के बैंक खाते का नम्बर देते हुए हर माह राशि जमा कराने के आदेश भी दिये। एसडीएम ने फैसले की प्रति थानाधिकारी को देकर बेटों एवं बहुओं को पाबंद करने के निर्देश भी दिये। इस फैसले से खुश दम्पति अपनी सुरक्षा एवं मासिक भत्ते का इंतजार कर ही रहे थे कि बाड़मेर के उपखण्ड मजिस्ट्रेट ने ठीक 15 वें दिन यानि कि 28 नवंबर 17 को ही अपना पूरा फैसला पलट दिया। अब तीनों बेटों से 500-500 रूपये यानि कि कुल 1500 रूपये बतौर गुजारा वृद्व दम्पति को देने के आदेश कर दिये। इस फैसले मे एसडीएम ने उनकी सुरक्षा, प्रताड़ित या मारपीट नही करने देने के लिए पाबंद करने जैसे अहम आदेश को भी भुला दिया। 
फैसले मे आती हैं उपरी दबाव की बू
एसडीएम इस एक्ट के तहत कोई भी आदेश करता हैं उसे न्यायिक आदेश माना जाता हैं। कोई भी न्यायिक अधिकारी अपने आदेश को रिव्यू नही कर सकता। इसी तरह बदले गये फैसले की प्रति एसडीएम ने बाड़मेर कलक्टर को सूचनार्थ दी हैं जबकि ऐसे न्यायिक फैसले की प्रति कलक्टर यानि कि उच्चाधिकारी को नही दी जा सकती। इससे जाहिर हैं कि बाड़मेर कलक्टर के मौखिक निर्देशों की पालना मे एसडीएम ने अपना फैसला गैर कानूनी ढंग से बदल कर कलक्टर को ध्यान मे लाने के लिए यह प्रतिलिपि दी हैं। 
आश्चर्य तो यह हैं कि इस एक्ट मे अप्रार्थी यानि कि बेटों को अपील का अधिकार भी नही हैं। यदि गुजारा भत्ता कम देने के आदेश देता हैं तो उसकी अपील सीनियर सिटीजन या माता पिता जिला कलक्टर को कर सकते हैं। इस प्रकरण मे तो एसडीएम ने उपरी दबाव सेे न केवल गैर कानूनी ढंग से रिव्यू कर दिया बल्कि अप्रार्थी यानि कि बेटों के प्रार्थना पत्र पर यह आदेश पलट दिया, जिसको वह करने के लिए अधिकारिता भी नही रखते। 
बहरहाॅल, जो भी हो, एक वृद्व दम्पति को बिना सुरक्षा के भय के माहौल मे सिर्फ 1500 रूपये मे अपना गुजारा करने को मजबूर होना पड़ेगा। इसमें इनकी बीमारी का इलाज भी शामिल होगा। इस राशि मे गुजारा और इलाज नही हो तो भले ही वे दर दर की ठोकरें खाने को मजबूर हो लेकिन उनकी सुरक्षा के लिए बना यह कानून अब उनकी कोई मदद नही कर पायेगा।