13 December 2017 00:00:00 AM Breaking News
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सभापति एवं आयुक्त की शह मे सूदखोरी के काले धंधे का पर्दाफाश

3 साल मे ब्याज सहित 2 गुना से अधिक रकम की वसूली
नगरपरिषद बाड़मेर का हैं मामला
बाड़मेर। बाड़मेर नगरपरिषद मे जोधपुर के एक निजी फाइनेन्सर से सांठगांठ कर नगरपरिषद के सभापति एवं अब तक के आयुक्तों ने सांठगांठ से सूदखोरी का काला धंधा इस हद तक चला रखा हैं कि कर्ज लेने वाले कर्मचारी से फाइनेन्सर 3 साल मे ब्याज सहित दो गुना से अधिक की रकम वसूल कर मस्ती से चांदी काट रहा हैं। अंदर की खबर के मुताबिक नगरपरिषद के आकाओं को यह फाइनेन्स बंधी बंधाई रकम बतौर हफ्ता(रिश्वत) दे रहा हैं।
सूत्रों ने बताया कि जोधपुर के एक निजी फाइनेन्सर ने कंपनी एक्ट मे एक कंपनी का पंजीयन करवा रखा हैं जिसका नाम हैं बाफना फाइनेन्स। इस फाइनेन्सर ने सन 2010 मे तत्कालीन आयुक्त कालू खां के सरंक्षण मे अपना कारोबार बाड़मेर नगरपरिषद मे शुरू किया। कालू खां ने एक सिम्पल पेपर पर बिना किसी लेटरहेड, बिना डिस्पेच नंबर के एक सहमति पत्र उक्त फाइनेन्सर को जारी किया कि नगरपरिषद के कर्मचारियों को आप द्वारा सुलभ करवाये जा रहे कर्ज की किश्तें आपके निर्देशानुसार तनख्वाह से काटी जाने की सहमति दी जाती है। बाद मे यह धंधा लगातार चलता गया और आज दिन तक बदस्तूर जारी है।
आश्चर्य तो इस बात का हैं कि तत्कालीन आयुक्त ने जो एमओयू फाइनेन्सर के साथ हस्ताक्षरित किया हैं उसमे कहीं भी नगद ऋण देने का उल्लेख किया गया हैं न किसी ब्याज दर का। उसमे घरेलू प्राॅडक्ट खरीदने के लिए फण्ड उपलब्ध करवाने का उल्लेख है। रिजर्व बैंक से बिना लाइसेन्स लिए कोई भी फाइनेन्स कंपनी नगद ऋण नही दे सकती। इसलिए निजी फाइनेन्सर ने घरेलू उत्पाद के लिए फण्ड उपलब्ध करवाने का एमओयू तैयार करवा दिया। एमओयू मे नगद ऋण एवं ब्याज दर को गोल कर दिया गया।
सूत्रों ने बताया कि उक्त फाइनेन्सर द्वारा खाली पेपर एवं स्टाम्प पर भी संबंधित कार्मिकों के दस्तखत करवाये जाते हैं तथा संबंधित आयुक्त से ऋण लेने वाले कर्मचारी की पे-स्लीप भी ली जाती है। 
सूत्रों ने बताया कि यह कंपनी 1 लाख का कर्ज लेने वाले कार्मिक को नगद 90. हजार देता हैं 10 हजार रूपये फाइल चार्ज आदि के रूप मे पहले से ही काट लिये जाते हैं और 1 लाख के कर्ज पर हस्ताक्षर करवाये जाते है। नगरपरिषद द्वारा मिली भगती के तहत कंपनी को कुल 36 महिने तक लोन लेने वाले कार्मिक की तनख्वाह से किश्त राशि काट कर उसके खाते मे जमा करवाने की संुविधा दी जा रही है। 1 लाख का कर्ज लेने वाले को 90 हजार देने के बाद कंपनी 4780 रूपये प्रतिमाह की किश्त कुल 36 महिने तक वसूल करती हैं और यह राशि नगरपरिषद अवैध रूप से कर्मचारी की तनख्वाह से काट कर निजी फाइनेन्सर कंपनी के खाते मे जमा करवाती है। इस तरह 1 लाख का कर्ज लेने वाले कर्मचारी को 36 महिने मे 172080 रूपये जमा करवाने पड़ते हैं और 10 हजार उससे फाइल चार्ज के रूप मे पहले ही वसूल कर दिये जाते है। 
इस तरह नगरपरिषद बाड़मेर के अफसर एवं सभापति की मिली भगती से सूदखोरी का काला धंधा सन 2010 से लगातार चल रहा है। कायदे से यह फाइनेन्सर नगद ऋण देने का व्यवसाय करने का न तो लाइेसन्स रखता हैं न अधिकार। इतनी बड़ी ब्याज दर पर नगरपरिषद के कर्मचारियों को कर्ज मुहैया करवाने का यह काला धंधा आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत अपराध भी है। पूरे मामले मे मुख्यमंत्री तक को शिकायत की गई लेकिन आज दिन तक परिषद अपने स्तर पर मामले को दबा कर बैठी हुई है।
जो भी अफसर/सभापति आया, भुगतान रोका, फिर चालू किया
ज्यों ज्यों अफसर और सभापति बदलते रहे हैं त्यों त्यों उक्त काले धंधे की किश्त वसूलने के लिए फाइनेन्सर की किश्तें काटने से रोक देते है। फिर सेटिंग होने के बाद पुनः चालू कर देते है। खबर हैं कि वर्तमान सभापति ने पूर्व आयुक्त श्रवण कुमार के वक्त भी 3 महिने तक किश्तों की कटौती अवैध बता कर रूकवा दी थी लेकिन बाद मे सौदेबाजी कर इसे वापस चालू करवा दिया। कटौती के चैक पर सभापति के हस्ताक्षर होते है क्यों कि यह राशि 2 लाख से अधिक की प्रतिमाह बनती है। 
ये हैं आईपीसी का अपराध
इस तरह अनाधिकृत रूप से एमओयू करने, कटौती की सहमति प्रदान करने एवं रिजर्व बैंक की निर्धारित ब्याज दर से अधिक ब्याज पर किश्तों की कटौती कर निजी फाइनेन्सर को फायदा पहुंचाने जेसे कृत्य भारतीय दण्ड संहिता के तहत अपराध हैं जिनमे 7 साल तक की सजा का प्रावधान है। लेकिन इस काले धंधे को वर्तमान सभापति भी बेखौफ पनाह दे रहे है।