23 October 2017 00:00:00 AM Breaking News
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पूर्व आयुक्त श्रवण विश्नोई की करतूत, फर्जी चिट्ठी भेज हांसिल की मंजूरी

छूट का लाभ लेकर 57 लाख मे खरीदी होटल भूमि को 9 करोड़ मे बिकवाया
बाड़मेर। नगरपरिषद की टाउनशीप योजना मे नई होटल नीति मे मिली 50 प्रतिशत छूट का लाभ लेकर 57 लाख मे खरीदी गई होटल भूमि को 9 करोड़ मे जालसाजीपूर्वक बिकवाने का सनसनीखेज मामला सामने आया हैं। नगरपरिषद के सभापति पूरे मामले को रफादफा करने की कोशिश मे हैं। पूर्व आयुक्त श्रवण विश्नोई ने रियायती दर की इस भूमि का संस्थानिक प्रयोजनार्थ भू उपयोग बदलवाने के लिए एक फर्जी चिट्ठी का सहारा लेकर राज्य समिति से मंजूरी भी दिलवा दी। लाखों की डील इस सौदे मे बतौर रिश्वत होने के आरोप लग रहे हैं।
प्राप्त खबर के अनुसार नगरपरिषद ने सदर थाने के समीप की टाउनशीप योजना मे डाटा विजन नामक कंपनी को 2007 मे नई होटल नीति मे दी जाने वाली 50 प्रतिशत रियायत का लाभ देकर 57 लाख 51 हजार मे होटल के लिए भूमि दी थी। जिस पर कायदे से सिर्फ होटल का निर्माण ही किया जा सकता था। 
लेकिन कंपनी ने पूर्व नगरपरिषद आयुक्त श्रवण विश्नोई के साथ बड़ी डील कर इस जमीन को करीबन 9 करोड़ मे बिकवाने का प्लान रचा। इस षड़यंत्र के तहत तत्कालीन आयुक्त ने उक्त होटल कंपनी की ओर से रियायती दरों पर दी गई होटल भूमि का भू उपयोग संस्थानिक प्रयोजनार्थ करवाने का आवेदन प्राप्त किया। इस आवेदन को जोधपुर के नगर नियोजन विभाग को भेजा, जहां से तकनीकी परीक्षण बाद कुछ शर्तो पर भू उपयोग परिवर्तन के निर्देश दिये। लेकिन चतुर एवं होशियार आयुक्त ने इस चिट्ठी मे यह कहीं नही लिखा कि उक्त भूमि रियायती दरों पर होटल उपयोग के लिए ही दी गई थी। 
इसके बाद इस आयुक्त ने यह मामला राज्यस्तरीय भू उपयोग परिवर्तन समिति को भेजा लेकिन उसमें भी रियायती दर पर होटल भूमि का आवंटन होने की बात को न केवल छुपाये रखा बल्कि राज्य समिति को गुमराह करने के लिए भेजे गये प्रस्ताव मे इस बात का झूठा और फर्जी ही उल्लेख कर दिया कि 27 जुलाई 16 को सम्पन्न हुई जिला स्तरीय भू उपयोग परिवर्तन समिति की बैठक ने इस प्रकरण को मंजरूी दे दी हैं। आश्चर्य एवं चैकान्ने वाली बात तो यह हैं कि 27 जुलाई 16 को बाड़मेर मे जिला स्तरीय भू उपयोग परिवर्तन समिति की कोई बैठक आयोजित ही नही हुई। ज्ञात रहे कि जिला स्तरीय भू उपयोग परिवर्तन समिति की बैठक का चेयरमेन नगरपरिषद का सभापति होता हैं एवं सदस्य सचिव खुद आयुक्त होता है। खबर हैं कि इस आयुक्त ने बिना बैठक हुए ही राज्य समिति को भेजे प्रस्ताव मे उल्लेख कर उक्त कंपनी को रियायती दर पर होटल प्रयोजनार्थ दी गई भूमि का संस्थानिक उपयोगार्थ भू उपयोग परिवर्तन करवाने की स्वीकृति हांसिल कर ली। 
और सबसे बड़ा कबाड़ा यह किया आयुक्त ने
तत्कालीन आयुक्त श्रवण विश्नोई की करतूतों का यहीं अंत नही हुआ। राज्य स्तरीय समिति की बैठक दिनांक 13 जनवरी 17 मे लिये गये सभी निर्णर्य संदिग्ध होने पर राज्य सरकार ने 3 जनवरी 17 को ही रोक लगा दी थी। लेकिन नगरपरिषद आयुक्त श्रवण विश्नोई ने इसकी भनक लगते ही दूसरे दिन 4 जनवरी 17 को उक्त होटल कंपनी के नाम डिमाण्ड नोट जारी कर दिया। कंपनी ने मिली भगती के तहत 9 जनवरी 17 को आरटीजीएस से नगरपरिषद के खाते मे करीबन 18 लाख रूपये की राशि बतौर भू उपयोग परिवर्तन शुल्क जमा करवा दी। इस कंपनी ने एक दिन बाद यानि कि 11 जनवरी 17 को ही उक्त भूमि का बेचान जरिए रजिस्ट्री संत निरंकारी संस्थान को कर दिया। 
आयुक्त की दरियादिली तो यह रही कि पूरी फाइल मे भू उपयोग परिवर्तन शाखा के किसी अधिकारिक लिपिक की टिप्पणी या हस्ताक्षर तक नही हैं पूरी फाइल को बिना लिपिकीय हस्ताक्षर एवं टिप्पणी के खुद ने ही चला कर कार्यवाही पूरी करवादी। इस तरह पूर्व आयुक्त ने जालसाजी कर रियायती दर पर सिर्फ 57 लाख मे बेची गई होटल भूमि को 9 करोड़ मे बिकवा कर बड़ी सौदेबाजी की हैं, अब यह देखना हैं कि राज्य सरकार पूर्व आयुक्त द्वारा बड़ी डील कर की गई जालसाजी के मामले मे क्या रूख अपनाती हैं।