23 October 2017 00:00:00 AM Breaking News
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बलात्कार मामले मे अहम फैसला, कमजोर नो का मतलब यस भी होता हैं

नई दिल्ली। बहुचर्चित फिल्म 'पीपली लाइव' के सह निर्देशक महमूद फारूकी की अपील पर दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला सुना दिया। कोर्ट ने फारूकी को आरोपों से बरी कर दिया है। महमूद फारूकी को 30 जुलाई को दिल्ली की साकेत कोर्ट ने कोलंबिया यूनिवर्सिटी की एक अमेरिकी रिसर्चर के साथ रेप का दोषी करार दिया था। फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने बेहद अहम टिप्पणी करते हुए कहा, 'हर बार नो का मतलब नो नहीं होता।' कोर्ट ने कहा, 'महिला का नो फारूकी के लिए स्पष्ट नहीं था। हाई कोर्ट के जज आशुतोष ने मामले में फैसला सुनाते हुए कहा कि हर बार नो का मतलब नो नहीं होता है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे भी कई उदाहरण हैं, जब महिला द्वारा एक कमजोर 'नो' का मतलब 'यस' भी हो सकता है। कोर्ट ने इस मामले में टिप्पणी करते हुए कहा, 'यह बात अब भी संदेह के दायरे में है कि महिला द्वारा बताया गया वाकया हुआ भी था या नहीं। और यदि हुआ भी था तो इस पर भी संदेह है कि ऐसा महिला की मर्जी के बगैर हुआ था।'

कोर्ट ने कहा, 'एक बात जो बेहद साफ है, वह यह है कि याचिकाकर्ता आरोपी के साथ पूर्व में बेहद कम समय में ही घनिष्ठ हो गई थी। आरोपी की शराब पीने की आदत से भी वह वाकिफ थी। दोनों के बीच संबंध सामान्य दोस्ती से कहीं ज्यादा थे।' महिला ने ही माना है कि फारूकी के साथ किस करना और गले मिलना उसे बिना किसी विरोध के स्वीकार्य था। एक मौके पर तो जब महिला फारूकी और उनकी पत्नी के साथ थी और पत्नी जब दूसरे कमरे में चली गईं तो दोनों ने एक-दूसरे को किस करने जैसा कदम उठाया। 
अपने फैसले मे कोर्ट ने कहा, 'सच तो यह है कि 28 मार्च 2015 की रात को जो हुआ निश्चित रूप से पिछले आचरण उसके लिए सहमति नहीं होंगे। यदि वह सब कुछ हुआ है तो हर सेक्सुअल ऐक्ट के लिए, हर बार, सहमति की जरूरत होती है। सहमति का मतलब अनिच्छा या नो नहीं होता है। 

न्यायालय के मुताबिक केस मे बताया गया है कि फारूकी उस रात को काफी आगे बढ़ गए थे। इसका साफ-साफ मतलब है कि दोनों के बीच पूर्व संबंध थे, जो हो सकता है कि इतने तीव्र न हुए हों, लेकिन दोनों के बीच शारीरिक संबंधों पर सहमति रही है। ऐसा कहीं भी नजर नहीं आ रहा है कि महिला के दिमाग में फारूकी को लेकर कभी भी कोई डर रहा हो। जबकि फारूकी के बयानों से लगता है कि गलती से या भूल से महिला इसके लिए सहमत थीं और दोनों ने इस कृत्य में समान भागीदारी निभाई। ऐसा जरूरी नहीं है कि हर बार किसी 'यस' का मतलब 'यस' और 'नो' का मतलब 'नो' हो।